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और नेहरू के बारे में मोदी की बेबुनियाद बातें -अरुण माहेश्वरी की डायरी से विशेष (पुराना आलेख) भारत की राजनीति में सरदार पटेल की विशेष पहचान

पटेल और नेहरू के बारे में मोदी की बेबुनियाद बातें -अरुण माहेश्वरी भारत की राजनीति में सरदार पटेल की विशेष पहचान किस बात से है ? रियासती राज्यों का भारत में विलय कराके भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण को सुदृढ़ करने से। इस एकीकरण की एक शुरूआत अंग्रेजों, बल्कि कंपनी राज के जमाने से ही हो गयी थी। 1834 का ‘डाक्ट्रिन आफ लैप्स’ – बेवारिस और नालायक राजाओं के राज्य को ब्रिटिश शासन के अधीन करने का विस्तारवादी डाक्ट्रिन। तहत लार्ड डलहौजी (1848-1856) ने तत्कालीन लगभग छ: सौ रियासतों में से झांसी, उदयपुर, अवध आदि 21 रियासतों को ब्रिटिश राज के अधीन कर लिया था। 1857 के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी था। ब्रिटेन में 18 जुलाई 1947 के दिन भारत की आजादी का कानून पारित हुआ। इसमें भारत के विभाजन के साथ ही रियासती राज्यों की आजादी की बात भी कही गयी थी। एक देश की सीमा में इतने स्वतंत्र देशों के अस्तित्व को असंभव समझ कर ही उसके पहले से माउंटबेटन ने रियासतों के मामले के लिये एक कोर कमेटी का गठन किया था जिसके सचिव थे सी एस वी पी मेनन। पटेल के एक करीबी अधिकारी। जिस समय नेहरू भारत के संविधान को तैयार करने में लगे हुए थे, पटेल के जिम्मे मेनन और माउंटबेटन के साथ रियासतों के मसले को सुलझाने का काम था। वैसे भी इन रियासती राज्यों की कोई स्वतंत्र हैसियत बची नहीं थी, इसीलिये चाय की टेबुल पर सभी राजाओं से हस्ताक्षर लेकर बड़ी आसानी से उस काम को पूरा कर लिया गया। लेकिन जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां और जूनागढ़ के नवाब तृतीय मुहम्मद महताब खांजी ने अडि़यल रुख अपनाया। जूनागढ़ का नवाब एक धमकी से मान गया, हैदराबाद के निजाम को मनाने के लिये गणपरिषद के के.एम.मुंशी आदि की मदद से कुछ मेहनत करनी पड़ी। जम्मू और कश्मीर के हरि सिंह को हिंदू महासभा का समर्थन था और वह भारत सरकार की एक नहीं सुन रहा था। ऐलेन कैंबल जान्सन ने अपनी किताब ‘मिशन विथ माउंटबेटन’ माउंटबेटन के अनुभव को बताते हुए लिखा है : ‘‘सरदार वल्लभ भाई पटेल के निर्देशों के अधीन गृह मंत्रालय बिल्कुल अलग, ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कर रहा था जिसका यह मायने लगाया जा सके कि वह कश्मीर के हाथ बांध रहा हो और साथ ही यह आश्वासन दे रहा था कि पाकिस्तान द्वारा उसे हथियाने की कोशिश को भारत नजरंदाज नहीं करेगा।’’ इससे जाहिर है कि कश्मीर के प्रश्न पर सरदार पटेल की भूमिका स्पष्ट नहीं थी। सन् 1950 में पटेल की मृत्यु हो गयी। भारत के एकीकरण का काम तब भी अधूरा था। फ्रांस और पुर्तगाल के हाथ में भारत के कुछ क्षेत्र रह गये थे। इन कामों को प्रधानमंत्री नेहरू ने पूरा किया। गोवा में तो सेना भी भेजनी पड़ी थी। कहने का तात्पर्य यह कि भारत के एकीकरण में पटेल और नेहरू एक दूसरे के पूरक थे। हैदराबाद में कानून-व्यवस्था के लिये पटेल सेना भेजना चाहते थे, नेहरू ने बाधा नहीं दी। कश्मीर में नेहरू और शेख अब्दुल्ला भारत में शीघ्र विलय के पक्ष में थे, पटेल प्रतीक्षा करना चाहते थे। लेकिन बाद में कश्मीर में सेना उतारने के मामले में दोनों एकमत थे। अब भी क्या कोई कहेगा कि यदि पटेल भारत के प्रधानमंत्री होते तो भारत की राजनीति की दिशा भिन्न होती ? इन दोनों व्यक्तित्वों को राजनीति के दो छोर बताना एक शरारतपूर्ण कोशिश है। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल शक्तियों और उससे अलग रहने वाली आरएसएस की तरह की ताकतों को भारत की राजनीति के दो छोर कहा जा सकता है। नेहरू-पटेल के छद्म द्वैत को खड़ा करके संघ सिर्फ अपने लिये समर्थन का आधार खोजना चाहता है। नेहरू और पटेल के बीच फर्क किसी भी दो व्यक्ति के बीच पाये जाने वाले विचार-आचरण के स्वाभाविक फर्क की तरह है। जो पटेल आजाद भारत के पहले चुनाव के पहले ही दिवंगत हो गये, उनकी धर्म-निरपेक्षता को कथित ‘वोट बैंक वाली धर्म-निरपेक्षता’ से अलग बताना नरेंन्द्र मोदी की ढेरों हवाई बातों की तरह ही एक और तीर-तुक्के वाली एक बात ह

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