बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह ने समाचार वेबसाइट द वायर पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा किया है।     

“मानहानि का मुकदमा” पिछले कुछ सालों से बार-बार मीडिया की सुर्खियों में आता रहा है। ताजा मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह द्वारा समाचार वेबसाइट द वायर पर किया गया “आपराधिक मानहानि” के मुकदमे का है। द वायर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि नरेंद्र मोदी सरकार के बनने के बाद जय शाह की कंपनी टेम्पल इन्टरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के टर्नओवर में  एक साल में 16 हजार गुना बढ़ोतरी हुई और उसके एक साल बाद कंपनी घाटे में दिखाकर बंद कर दी गयी। खबर आने के बाद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इसे बेबुनियाद बताया था। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि जय शाह वायर पर 100 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा करेंगे। लेकिन सोमवार (नौ अक्टूबर) को जब जय शाह ने द वायर पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा किया, न कि सिविल मानहानि का जिसमें हर्जाने की मांग की जाती है। आइए आपको बताते हैं कि भारतीय कानून के अनुसार क्या है मानहानि और आपराधिक और सिविल मानहानि में क्या अंतर है।
भारतीय कानून के अनुसार मानहानि- भारतीय कानून के अनुसार मानहानि आपराधिक और सिविल (नागरिक) दोनों ही हो सकती है। दोनों में बुनियादी अंतर उसके द्वारा मांगी जाने वाली राहत का है। सिविल मानहानि में दोषी से उसकी वजह से हुए नुकसान के हर्जाने की मांग की जा सकती है। वहीं आपराधिक मानहानि में दोषी को सजा देने की मांग की जा सकती है ताकि दूसरों को उससे सबक मिले। आपराधिक मानहानि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत अपराध है। वहीं सिविल मानहानि टॉर्ट लॉ (कॉमन लॉ) के तहत आता हैं। टॉर्ट लॉ के प्राकृतिक न्याय के तहत अपने स्वविवेक और पुरानी नजीर के आधार पर फैसले देते हैं। आपराधिक मानहानि में “किसी भी संदेह से परे” अपराध साबित करना होता है। लेकिन सिविल मानहानि में संभावना के आधार भी हर्जाना का फैसला किया जा सकता।
आईपीसी की धारा 499 के तहत आपराधिक मानहानि?- सरल भाषा में कहें तो इस कानून के तहत शब्दों, प्रतीकों, चित्र इत्यादि का मौखिक या मुद्रित माध्यम से किसी भी किसी व्यक्ति को बदनाम करने की नीयत से इस्तेमाल करना भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध है। आईपीसी की धारा 500 के तहत आपारधिक मानहानि के दोषी को दो साल तक की जेल और हर्जाना या दोनों की सजा हो सकती है। हालांकि अगर मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति बन जाती है तो आपराधिक मानहानि का मुकदमा वापस लिया जा सकता है।
आपराधिक मानहानि पर आईपीसी के साथ ही सीआरपीएसी के तहत कार्रवाई होती है। यानी केवल पुलिस में शिकायत कर देने से आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। पीड़ित को मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराना होता है उसके बाद अगर अदालत पीड़ित की दलली से सहमत होगी तो वो आोरपियों को गिरफ्तार करने के लिए समन जारी करेगी। समन जारी होने पर आरोपियों को अदालत में हाजिर होकर जमानत लेनी पड़ती है। अगर पीड़ित अदालत के सामने ये साबित कर देता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो मुकदमा आगे बढ़ता है, नहीं तो आरोपी को तत्काल बरी कर दिया जाता है।
सिविल मानहानि के तहत मुकदमा– सिविल मानहानि दो तरीके से होती है- एक लिखित रूप से दूसरी बोलकर। सिविल मानहानि में दोषी साबित करने के लिए अदालत  में ये साबित करना होता है कि लिखित या मौखिक रूप से कही गयी बात झूठी, बदनाम करने वाली और आम जनता या एक वर्ग की नजरों में वादी को अपमानित करने वाली है।
सिविल मानहानि का मुकदमा सिविल कोर्ट या हाई कोर्ट में दायर किया जाता है। इसके तहत पीड़ित अदालत से सीधे-सीधे कथित मानहानि की वजह से हुए नुकसान के एवज में हर्जाने की मांग करता है। अगर न्यायाधीश को लगता है कि वादी की याचिका का पुष्ट आधार है तो वो दोनों पक्षों को नोटिस भेजता है। अपराध साबित होने के बाद ये तय होता है कि पीड़िता द्वारा मांगे गये हर्जाना कितना वाजिब है। सिविल मानहानि में पीड़ित मानहानि करने वाली सामग्री के प्रकाशन या प्रचार पर रोक लगाने की भी मांग कर सकता है।
  

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