एक छोटे से अखबार का भला क्या गणित होता है। कुल जमा पांच हजार प्रतियां बिक जाएं रोज तो अखबार सिद्ध और प्रसिद्ध हो जाये। बिक रही प्रतियों के हिसाब से विज्ञापन मिल जाएं तो अखबार का खर्च ठीक चलता रहे और विस्तार पर कुछ सोचा जा सके। सिरसा में अखबार के कुल पाठक ही 5000 होंगे उनमे बहुतो के पास सांध्य दैनिक नही आता, कुछ के पास कोई दूसरा अखवार आता है,  कुछ बाबा के चेले है और कुछ विज्ञापन दाता बाबा के डेरा से कारोबार से जुड़े है , कुछ को राशिफल पढ़ना है जो छत्रपति नही देते और कुछ का हाजमा ही नही है कि वह छत्रपति का अखबार पूरा सच पचा पाए।

गणित के हिसाब से सोचिए तो फिर बचा क्या। बचा सिर्फ छत्रपति जो गणित नही समझता था। आज उस बचे हुए छत्रपति को समझने की जरूरत है जो गणित के महीन जानकारों के बीच बिना गणित के उतरता है और बहुतों का गणित बिगाड़ देता है।
गणित समझने वाला व्यक्ति अपनी बुक्कत जितने आंकड़ो में खेलता है। उसकी जिंदगी की गुना भाग इतनी ही होती है कि जिंदगी निर्विघ्न चलती रहे और इसके लिये वह गीदड़ की जिंदगी जीना स्वीकार कर लेता है जिसे मरे हुए शिकार में से बची हुई जूठन मिलती रहती है, जूठन छोडने वाला माई बाप होता है। माई बाप तमाम उम्र निरीह जानवरो का शिकार करता है। गीदड़ कभी चूं नही करता लेकिन जैसे ही माई बाप का खुद का शिकार हो जाता है ,  वही गीदड़ सबसे ज्यादा मुखर होता है।
छत्रपति को यह गणित कभी नही आया। उसकी नजर बिजनेस पर नही खबर पर होती थी। आर्य समाज से चौधरी देवी लाल ट्रस्ट को जमीन देने की एक खबर थी। रात के अंधेरे में इस जमीन की रजिस्ट्री तहसील सिरसा में हुई जिसकी किसी को भनक तक नही लगी। लेकिन पूरा सच के मुख्य पन्नो पर वह खबर अगली शाम को थी। उस खबर का असर इतना बड़ा था कि सियासी तापमान में उछाल आ गया, आर्य समाज के पदाधिकारियों की तुरंत क्लास लगी । गणित समझने वाला कोई पत्रकार समझ सकता है तब की सत्ता का खौफ। और खौफ इतना ही नही बल्कि यह भी कि स्थानीय अखबारों की तब फ़ॉलोउप न्यूज़ देने की भी हिम्मत नही हुई।  इस खबर के बाद हर कोई पूरा सच पढ़ना चाहता था लेकिन छत्रपति ने प्रसार संख्या पर कोई खास ध्यान नही दिया और सेल्स पर एक प्रभारी नियुक्त करके अपनी खबरदारी में जुटा रहा।
पूरा सच का वार्षिक सम्मेलन हुआ 20 अक्टूबर 2002 को। उस सम्मेलन में पूरा सच को पत्रकारिता की उपलब्धियां बताने की जरूरत नही थी। अखबार  की रोज पाठकों  को  उडीक रहती लेकिन साल की वित्तीय उपलब्धि अगर छत्रपति से पूछ ली जाती तो सिरसा का सबसे ख्यात अखबार होने के बावजूद अखबार नुक्सान् में था और छत्रपति घर से हर माह पैसे डाल रहा था। गणित का होशियार आदमी अखबार की प्रसिद्धि को अवश्य भुनाता लेकिन इतना स्वाभाविक और सरल काम भी छत्रपति कर नही पाया ।
गणित तो और भी बहुत थे। मैंने 22 अक्टूबर 2002 को छत्रपति का सबसे अलग रूप देखा। वार्षिक सम्मेलन कार्यक्रम की समीक्षा हेतु छत्रपति ने मुझे बुलाया लेकिन समीक्षा की बात को परे कर उसने कहा सुन, मै डेरा की आमदनी का भंडाफोड़ करने वाला हूं। मैं जिंदगी में पहली बार छत्रपति के विराट रूप से डर गया था। मैंने कहा, प्रधान जी क्यो जान जोखिम में डालते हो। छत्रपति अपनी अलमारी से किताब निकालते हुए मेरी और पीठ किये खड़े थे। और यकीनन उनकी पीठ थी तभी मैं यह कहने का साहस कर पाया कि बच्चे पाल लो प्रधान जी। बाकी भी तो चला रहे हैं अख़बार। यदि उनकी आंख से मेरी आँख मिल रही होती तो मैं यह बात कह नही पाता। उन्होंने मेरी और मुड़ते हुए मेरी आँख में आंख डाल दी। बोले,,- तू कभी नही मरेगा?।” मैंने उनकी आंख में निडरता देखी। वहां गणित नही था। मैं किस गणित की बात कर रहा हूं। डेरा सच्चा सौदा छत्रपति को इतने रुपये देने को राजी था कि वह a4 अखबार साइज से सीधे बड़ी अखबार का सेटअप डाल लेता। गणित जानने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगो ने डेरा के साथ खूब पहाड़े खेले है। एक दूनी दूनी और 10 दूनी एक करोड़। डेरा ने कहा सत्यवचन। जिस दिन आदितय इंसां पकड़ा जाएगा उस दिन सबके पहाड़े उजागर होंगे।
छत्रपति धर्म पर खड़ा था। छत्रपति अधर्म के खिलाफ खड़ा था। धर्म और अधर्म के घालमेल के लिए गणित की जरूरत होती है लेकिन धर्म को जब अधर्म के खिलाफ़ आवाज उठानी होती है तब उसे सबसे पहले गणित को ही बाहर करना होता है।
22 अक्टूबर 2002 की रात मै सोया नही। छत्रपति ने साध्वी की चिठी क्यो छापी जब कोई भी छापने को राजी नही था। क्या छत्रपति सच जानता है । क्या छत्रपति साध्वी से मिल चुका है। रणजीत सिंह की खबर के पीछे छत्रपति ही क्यो लगा है। रणजीत सिंह का कत्ल हो गया है यह खबर भी छत्रपति ही निकाल कर लाया। रणजीत सिंह के कत्ल की कहानी बना कर उस पर मिट्टी डाली जा चुकी थी, छत्रपति ने उस कत्ल को खबर बना दिया। क्यो छत्रपति शुदायी बना हुआ है। क्यो छत्रपति इस कदर बेचैन है। क्यो छत्रपति डेरा सच्चा सौदा से डर नही रहा। क्यो रणजीत के कत्ल के बाद डरने की बजाय छत्रपति और मुखर और निडर हो गया है। क्या  छत्रपति साध्वी को जुबान दे बैठा है कि बहनो की लड़ाई हम लडेंगे।
छत्रपति के इस व्यक्तित्व को गणित के किसी परिमाप में नापा नही जा सकता । लेकिन गणित के मर्मज्ञ पत्रकार साथियो ने जिंदा हाथी की 15 साल मुफ्त सवारी की और हाथी मरने के बाद भी बेचने के गणित में बाजी जीतने की जिद तक प्रतियोगिता में रत है।
छत्रपति को जब फूल चढ़ाने आओ तो उस दिन आईना जरूर देख कर आना। 
छत्रपति की लड़ाई परिणति तक पहुंची है। आज मन बहुत उदास है। आज छत्रपति की हत्या का केस अंतिम सुनवाई पर है
बाबा जेल जा चुका है। यकीनन जेल में वह सोचता होगा कि गणित की इस दुनिया मे सब लोग गणित के फार्मूलों में फिट नही होते। कुछ लोग छत्रपति भी होते हैं।
 -वीरेन्द्र भाटिया

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