✍️अरुण माहेश्वरी

वरिष्ठ स्तंभकार एवं लेखक

नोटबंदी में काले धन की काली बिल्ली तिलिस्म की पोटली से आई बाहर

बिल्ली थैले के बाहर आ गई है । नोटबंदी के जिस दुष्प्रभाव को यूपी के चुनाव तर आँकड़ों में हेरा-फेरी के ज़रिये छिपा कर रखा गया था, उसे अंतत: सामने आना ही था । उसी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने कल जो आँकड़े जारी किये, वे बताते है कि भारत में उत्पादन में विकास की दर में तेज़ी से गिरावट दिखाई देने लगी है । पिछले वित्तीय साल की अंतिम तिमाही में जीडीपी में वृद्धि की दर गिर कर सिर्फ 6.1 प्रतिशत रह गई है । पिछले साल जीडीपी में वृद्धि की दर 8 प्रतिशत थी, जिसके कारण भारतीय अर्थ-व्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थ-व्यवस्था का दर्जा प्राप्त हुआ था, अब उससे वह दर्जा छिन गया है । इस तिमाही में चीन में 6.9 प्रतिशत की वृद्धि की दर लगातार जारी रही है । 

पिछले एक साल में जीडीपी में वृद्धि की कुल दर 7.1 प्रतिशत रही है जो नरेन्द्र मोदी के पिछले तीन सालों में सबसे कम वृद्धि की दर है । 
क्या अब भी प्रधानमंत्री यह झूठा दावा करने का साहस करेंगे कि ‘हार्डवर्क’ ने ‘हारवर्ड’ को पराजित कर दिया है अर्थात उनकी झूठी मेहनत ने अर्थशास्त्र के नियमों को हरा दिया है । आम लोगों की जिंदगी में मची त्राहि-त्राहि के प्रत्यक्ष सत्य को झुठलाते हुए जेटली और नरेन्द्र मोदी गला फाड़ कर पिछले दिनों कह रहे थे, नोटबंदी ने अर्थ-व्यवस्था को लाभ पहुँचाया है और इन्होंने सीएसओ को भी अपनी मर्ज़ी के आँकड़े पेश करने के लिये बाध्य किया था । अब यह खुल कर सामने आ रहा है कि, जैसा मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था, जीडीपी में नोटबंदी के  कारण 2 प्रतिशत की गिरावट होगी । उनकी वह भविष्यवाणी क्रमश: सच साबित हो रही है, और जेटली-मोदी कंपनी कोरे प्रवंचक प्रमाणित हो रहे हैं । 
देखिये इसके बारे में आज के टेलिग्राफ़ की इस रिपोर्ट को :

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