गुजरात 2002

आज मिला है बिलकीस बानो को न्याय 

पर  याद आती है तब की संसद की 

‘ धर्मराज’ धृतराष्ट्र के शासन की

जब बानो के साथ हुई दरींदगी

और एक गर्भवती के गर्भ तक को चीरते बजरंगी 

पर काँपते हुए चीखे थे हम
वे ख़ौफ़नाक मंज़र

दरिंदगी के स्मारक ! राहत शिविर !

जले हुए घर, जली-अधजली लाशें

बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, औरतों को नंगा करना

उनके गुप्तांगों में डाल देना कोई चीज़, ज़िंदा जला डालना

वो नरोदापाटिया, अहसान जाफ़री वो कौसर बानो

‘धर्मराज’ की दुर्योधनी संतानों में से एक ने 

हंस कर कहा कहा था 

“कौन सी कपोल कहानियाँ सुना रही है आप ।” 
काँप जाती हूँ 

आज भी उस मंत्री की कूट हँसी को याद कर 
तुमने तो वह सब ख़ुद भोगा था बानो ! 
नीम बेहोशी में 

अधखुली सी तुम्हारी आँखें 

देख रही थी बस लाशें ही लाशें 

तुम्हारे अपनों की लाशें ! चौदह लाशें !

जिसमें लहू से लथपथ तुम्हारी …

तीन साल की बेटी भी थी
वे भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े थे तुम पर

नहीं सुनी थी तुम्हारी कोई बात

कि पेट में पल रहा है पाँच महीने का गर्भ !
वो 2002 का गुजरात !

वो हैवानियत !

कैसे किया था तुमने बर्दाश्त !
जो अपनी दरींदगी को 

बता रहे थे हमारी कल्पना 

पंद्रह साल बाद 

अदालत ने उस डरावनी ‘कल्पना’ को 

हकीकत बना दिया है 

तब हत् वाक थे 

असहाय 

याद कर रहे थे बापू को 

खोज रहे थे उसके वैष्णव जन को 

वली गुजराती को

दे रहे थे 

गुजराती तहज़ीब के तीर्थ की 

दुहाइयाँ 
ओ मेरी बानो !

न्याय की तुम्हारी गुहार 

डर से निजात पाने

इस शहर से उस शहर 

तुमने अपनी नहीं

लड़ी हम सबकी लड़ाई 
आज तुम्हारे शौहर की आँखों में आँसू थे

आँखें हमारी भी भरी हुई हैं 

जीवन संसद के सूअर बाड़े में नहीं

बसता है कहीं और 

इंसाफ़ की लड़ाई में ही 

हैं उसका ठौर ।
  

सरला माहेश्वरी


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