भारतीय पत्रकारिता में सत्ताधारियों का ढोल बजाने वाले स्तंभकारों में तवलीन सिंह

मौकापरस्त दक्षिणपंथियों की एक खास पहचान होती है कि जो है, या चलन में है, उसे ही परम सत्य मान कर उसकी पूजा-आराधना में जुट जाओ।

 भारतीय पत्रकारिता में ऐसे, सत्ताधारियों का ढोल बजाने वाले मूढ़मति स्तंभकारों में एक शीर्षस्थ नाम है – तवलीन सिंह। आज इन महोदया ने अपने स्तंभ में कश्मीर का ‘संघ-राग’ अलापा है। ‘घाटी में नई नीति की जरूरत’ का राग। 

 

सप्तमस्वरों में अपने भक्ति गान की मूच्र्छना में वे कश्मीर के पत्थरबाजों के ‘मुजाहिदी’ उद्देश्यों के अंदेशे से ऐसे तांडव में उतर गई हैं कि केंद्र सरकार से यह कहने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं हुई कि घाटी के लोगों के भूखों मरने का इंतजाम करो ! वे जब भूख से बेदम हो जाए तब उनसे कहो कि पहले पंडितो को बसाओ तभी कोई बात होगी ! 
उन्होंने और भी सलाह दी है कि केंद्र सरकार को घाटी को भूल कर उसी प्रदेश के जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को उसी प्रकार ‘स्वर्ग’ बनाने में लगना चाहिए, जैसा ‘स्वर्ग’ वे पूरे भारत में बना रहे हैं !

 

इधर कुछ संघी चैनल बड़े उत्साह से मध्य प्रदेश के भील में पत्थरबाजी का प्रशिक्षण ले रहे कुछ लोगों का वीडियों दिखा रहे थे। 
क्या आपको तवलीन सिंह में ऐसे ही प्रतिशोध की आग में जलते जवाबी पत्थरबाजों की छवि नहीं दिखाई देती है !


अरुण माहेश्वरी

✍वरिष्ठ स्वतन्त्र लेखक एवं साहित्यकार

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