नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में वरिष्ठ भाजपा नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी व अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश का मामला चलाए जाने का फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘यह एक ऐसा अपराध था जिसने 25 साल पहले देश के संविधान के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को हिला कर रख दिया था।’

शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके बावजूद अगर मामले के दोषी न्याय की दहलीज तक नहीं लाए गए तो इसकी वजह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार का रवैया है।


आपराधिक साजिश का मामला फिर से चलाए जाने के साथ ही न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष और न्यायमूर्ति रोहिंटन फाली नरीमन ने बुधवार को मामले को रायबरेली से लखनऊ सत्र अदालत को स्थानांतरित कर दिया।


पीठ की तरफ से न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा, “मौजूदा मामले में जिस अपराध ने देश के संविधान के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को हिला दिया था, वह कथित रूप से आज से लगभग 25 साल पहले अंजाम दिया गया था।”
उन्होंने कहा कि आरोपियों को न्याय के कठघरे तक सीबीआई के रवैये के कारण नहीं लाया जा सका क्योंकि जांच एजेंसी कथित आरोपियों पर संयुक्त मुकदमे में आगे नहीं बढ़ रही थी, साथ ही इसकी वजह कुछ तकनीकी दिक्कतें थीं जो आसानी से ठीक हो सकती थीं लेकिन जिन्हें राज्य सरकार ने ठीक नहीं किया।
आपराधिक साजिश के मामले को रायबरेली से लखनऊ की अदालत में स्थानांतरित करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि सत्र अदालत धारा 120-बी के तहत आडवाणी, जोशी, उमा भारती (अब केंद्रीय मंत्री), विनय कटियार, साध्वी रितंभरा और विष्णु हरि डालमिया के खिलाफ एक अतिरिक्त आरोप का निर्धारण करेगी।
मामले के दो आरोपियों, आचार्य गिरिराज किशोर और अशोक सिंघल का निधन हो चुका है।
अदालत ने कहा कि धारा 120-बी और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत लगने वाला यह अतिरिक्त आरोप चंपत राम बंसल, सतीश प्रधान, धर्मदास, महंत नृत्यगोपाल दास, महामंडलेश्वर जगदीश मुनि, राम विलास वेदांती, वैकुंठ लाल शर्मा प्रेम और सतीश चंद्र नागर के खिलाफ दायर संयुक्त आरोप पत्र में उल्लिखित आरोप के अनुरूप होगा।
अदालत ने कहा कि कल्याण सिंह को राजस्थान का राज्यपाल होने के कारण संविधान के प्रावधानों के हिसाब से छूट मिली हुई है। अदालत ने कहा कि सत्र अदालत जैसे ही कल्याण सिंह राज्यपाल के पद से हटेंगे, उनके खिलाफ आरोप निर्धारित करेगी और मामला चलाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मौजूदा स्थिति में यह सर्वाधिक उपयुक्त है कि रायबरेली में जारी कार्यवाही को लखनऊ के सत्र न्यायलय में स्थानांतरित कर दिया जाए। इससे मामले में शामिल लोगों के खिलाफ संयुक्त आरोप पत्र में उल्लिखित तमाम अपराधों पर संयुक्त रूप से एक साथ मुकदमा चलाया जा सकेगा।
शीर्ष अदालत ने निचली अदालत से कहा कि वह इस फैसले की प्रति पाने के दिन से दो साल के अंदर इस मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला दे। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि साक्ष्य संबंधी हर तारीख पर अभियोजन पक्ष का कोई न कोई गवाह मौजूद रहे ताकि गवाहों की मौजूदगी न होने के कारण मामले को स्थगित होने से रोका जा सके।
अदालत ने कहा कि मामले की रोज सुनवाई की जाए और इसमें किसी तरह का स्थगन न हो जब तक कि सत्र अदालत को ऐसा न लगे कि किसी तिथि विशेष को सुनवाई हो ही नहीं सकती। ऐसी हालत में सबसे निकट की तारीख देनी होगा और मामले को स्थगित करने का लिखित रिकार्ड रखना होगा।

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