★समर्पित भाजपाईयों को नहीं भाया चयन, चेयरमैन और उप-चेयरमैन 

★भाजपा विचारधारा से नहीं, आरएसएस ने साधी चुपी
ईश्वर धामु/😉

भिवानी।  भिवानी नगर परिषद को चार महीनों के लम्बे इंतजार के बाद रणसिंह यादव के रूप में चेयरमैन मिल गया। चेयरमैन का नाम तय करने के लिए भाजपा को भी बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। कई दौर की बैठके चली। लेकिन भाजपा का किसी भी प्रत्याशी पर विश्वास जम नहीं रहा था। 

एक बड़ा कारण यह भी था कि भाजपा का अपना ऐसा कोई प्रत्यायाी नहीं था, जिसको पार्षदों का बहुमत प्राप्त हो। वैसे भी भाजपा ने चुंकि अपने चिंह पर चुनाव नहीं लड़ा था तो जो लोग जीत कर पार्षद बने थे, उन्ही में से चयन करना था। सत्तासीन पार्टी होने के कारण भाजपा को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। 

नगर परिषद के आठ जनवरी को हुए चुनाव के बाद एक-एक कर 17 पार्षद भाजपा की गोद में जा बैठे। भाजपा के स्थानीय नेताओं अपनी उपलब्धि पर खुश थे। परन्तु उनकी यह खुशी अधिक समय तक नहीं चली। 

जब चेयरमैन बनाने का सवाल आया तो भाजपा के सामने यक्ष प्रश्र आ गया कि चेयरमैन की जिम्मेदारी किसको सौंपी जाए? इससे पहले पार्र्टी द्वारा नियुक्त प्रवेक्षकों ने स्थानीय नेताओं की सहमति से कुछ सीमाएं निर्घारित कर ली। इन्ही सीमाओं में रह कर चेयरमैन तय करना भाजपा के लिए भारी हो गया। 

इसी असमंजस में भाजपा ने एक बार फरवरी में होने वाले चुनाव को स्थगित के करवा दिया। इसी देरी के चलते पार्षदों का मोह भंग होता चला गया और भाजपा का टेग लगाने वाले पार्षदों की संख्या 6 रह गई। 

आखिर पार्टी के प्रवेक्षक प्रदेश के मंत्री मनीष ग्रोवर तथा महासचिव संजय भाटिया ने रोहतक में भाजपा सांसद और विधायकों को साथ लेकर पार्षदों और वरिष्ठ पदाधिकारियों की मेराथन बैठक कर एक नाम तय कर लिफाफे में बंद कर दिया। 

भाजपा द्वारा प्रत्यायाी चयन में देरी का लााभ विपक्षी विचारधारा के पार्षदों ने उठाया। ये गैर-भाजपाई पार्षद पूर्व चेयरमैन एंव इनेलो नेता विजय पंचगामा के नेतृत्व में लामबंद हो गए। 

भाजपा द्वारा चेयरमैन का नाम लिफाफे में बंद करना इन पार्षदों को भाया नहीं और इन 13 पार्षदों ने चुनावी बैठक का बहिष्कार कर दिया। जब भिवानी के लधु सचिवालय के डीआरडीए सभागार में चेयरमैन के चुनाव की प्रक्रिसा चल रही थी तो असंतुष्ट पार्षद विजय पंचगामा के निवास पर भविष्य की रणनीति तय कर रहे थे। 

दूसरी ओर मिली जानकारी के अनुसार सभागार में जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई तो बंद लिफाफा खोला जाना था तो वंहा मौजूद 16 पार्षदों ने चुनाव करवाने की बात उठाई। लेकिन वंहा मौजूद सांसद धर्मबीर सिंह और विधायक घनश्याम सर्राफ ने चुनाव की बजाए एकमत से चुनाव का माहौल बना दिया। 

इस तरह लिफाफे वाले नाम रणसिंह यादव को सर्वसम्मति से चेयरमैन बना दिया। उप-चेयरमैन का चुनाव पार्षदों की जीद पर करवाना पड़ा तो मामनचंद चार वोट से विजय रहे। भाजपा के चुनावी प्रवेक्षकों की मौजूदगी में नेताओं ने एक दूसरे को बधाई दी और जीत का श्रेय अपने नेतृत्व को दे दिया। 

लेकिन जब जश्र से भाजपाई को राहत मिली तो उनको ध्यान आया कि ना तो चेयरमैन रणसिंह यादव और ना ही उप-चेयरमैन मामनचंद भाजपा से हैं। 

भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि रणसिंह यादव का कभी भी भाजपा से सम्बंध नहीं रहा है। वह चेयरमैन पद की लालसा में भाजपा खेमे में आया था। लेकिन भाजपा ने उसे दिल से नहीं अपनाया था। इस पर बाढड़ा के विधायक सुखविंद्र सिसंह मांढ़ी ने उसकी सिफारिश कर दी तो भाजपा पदाधिकारियों के दिल में सोफ्ट कार्नर बन गया। 

चेयरमैन पद की दौड़ में रणसिंह भी शामिल था। उसने जोड़तोड़ की राजनीति से पार्षदों के बहुमत के साथ भाजपा नेेताओं का भी विश्वास जीत लिया। 

इसी तरह उप चेयरमैन बने मामनचंद ने पहला चुनाव इनेलो के नाम पर जीता था और परिस्थितयोंवश उप-चेयरमैन बन गया था। तत्कालीन चेयरमैन विजय पंचगामा को कांग्रेस शासन द्वारा हटाए जाने पर मामन चंद को कार्यकारी चेयरमैन बना दिया गया। अपनी कार्यकाररी चेयरमैन की कुर्सी बचाने के लिए मामन चंद ने कांग्रस का दामन थाम लिया और मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के दरबार में हाजनी लगाने लगा आौर अभी तक उनमें हुड्डा प्रेम बरकरार है। 

भाजपा के हार्डकोर समर्थक और कार्यकर्ता रणसिंह यादव और मामन चंद को हजम नहीं कर पा रहे हैं। क्योकि इन दोनों को ही भाजपा की मुख्य धारा का बेसिक ज्ञान ही नहीं है। एक भााजपा कार्यकर्ता ने कहा कि इन लोगों को भाजपा संस्कृति का ज्ञान न होने के कारण इनके पास आपसी बातचीत के शब्द भी नहीं है। 

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने चाहे उनके पदो को स्वीकार लिया हो पर भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता अभी भी दूरी बनाए हुए है। आरएसएस ने चुपी साधी हुई है। लेकिन आरएसएस का स्थानीय नेतृत्व भी इस चयन से खुश नहीं बताए जा रहे है। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि नए चेयरमैन की कार्यप्रणाली भाजपाई स्टाइल की न होने के कारण शीध्र टकराव की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 

भाजपाई सूत्रों का कहना है कि भाजपा का राज होने के बाद भी कांग्रेस का उप-चेयरमैन बनना पार्टी के लिए इज्जत का प्रश्र नहीं है। चर्चाकारों का कहना है कि चेयरमैन आौर उप-चेयरमैन का भाजपा से वैचारिक मतभेद नगर परिषद के कामों में बाधा रहेगा। 

इस तरह नगर परिषद के चेयरमैन की कुर्सी मिलने के बाद भी भाजपा के हाथ खाली है। दूसरी और असंतुष्ट गगैर-भाजपाई पार्षदों के गुट ने इस चुनाव पर प्रश्रचिंह लगाते हुए इसे असंवैधानिक बताते हुए अदालत में जाने की बात कही है।

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