गुरु तेग बहादुर जी प्रकाशोत्सव पर विशेष

धर्म, देश और मानवता के नाम पर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले परम त्यागी महापुरुषों में सिख गुरुओं का आदर्श स्थान रहा है। इसी श्रृंखला में सिखों के नवम गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान  विश्व  इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। गुरु तेग बहादुर जी का जन्म बुधवार  18 अप्रैल 1621 को पंजाब के अमृतसर  में हुआ था। ये सातवें गुरु हरगोविन्द जी के पांचवें पुत्र थे। हरगोविन्द जी के पोते और आठवें गुरु हरिकृष्ण राय जी की असमय मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा गुरु तेग़ बहादुर सिंह जी नवम गुरु बनाए गए थे।

गुरु तेग बहादुर सिंह का  बचपन का नाम त्यागमल था। 13 वर्ष आयु में उन्होंने अपने पिता गुरु हरगोविन्द जी से साथ मुगलों की सेना, जिसने उनके गांव पर हमला किया था, के साथ होने वाले युद्ध में साथ ले जाने के लिए आज्ञा मांगी। अपनी तलवार को बिजली की गति से घुमाते हुए मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेगबहादुर (तलवार के धनी) रख दिया।
गुरू तेग़ बहादुर सिंह जी युद्ध की हिंसा और रक्तपात से क्षुब्ध होकर वैराग्य और साधना की ओर उन्मुख हुए। इस दौरान धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेगबहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की। गुरु जी ने धर्म के प्रसार  के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। अष्ठम सिख गुरु हरकिशन जी द्वारा आपको अपना उत्तराधिकारी घोषित करने पर उनके अनुयायिओं ने उनको खोज कर उनसे उत्तरदायित्व संभालने का अनुरोध किया, तब गुरू तेग़ बहादुर सिंह सिखों के नवम गुरु पद पर सुशोभित हुए।
आध्यात्मिक, सामाजिक परोपकारी यात्राओं के दौरान 1666 में गुरुजी के यहां पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ, जो दसवें गुरु- गुरु गोविंद सिंह बने।
मुगल शासक औरंगजेब को धार्मिक कट्टरता की वजह से इस्लाम के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा तक  सहन नहीं थी। औरंगजेब के दरबार में एक कश्मीरी पंडित प्रतिदिन गीता के श्लोक सुनाते थे। उन पंडित को उन श्लोकों की व्याख्या उसी रूप में करनी होती थी कि औरंगजेब के अहंकार तथा धर्मान्धता को चोट न पहुंचे। कुछ दिन पंडितजी के अस्वस्थ होने के कारण उनके पुत्र को इस दायित्व का निर्वाह करना था। उन्होंने गीता के बहुत सारे श्लोक बादशाह को उनके मौलिक अर्थ सहित सुनाये, तो औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि हिन्दू धर्म ग्रन्थ श्रेष्ठ हैं तो औरंगजेब ये सहन न कर सका और उसकी कट्टरता और भी बढ़ गई।
जुल्म से त्रस्त कश्मीरी पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएं दी जा रही हैं। गुरु चिंतातुर हो समाधान पर विचार कर रहे थे तो उनके नौ वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम(गोविन्द सिंह ) ने उनकी चिंता का कारण पूछा ,पिता ने उनको समस्त परिस्थिति से अवगत कराया और कहा इनको बचने का उपाय एक ही है कि मुझको प्राणघातक अत्याचार सहते हुए प्राणों का बलिदान करना होगा। वीर पिता की वीर संतान के मुख पर कोई भय नहीं था कि मेरे पिता को अपना जीवन गंवाना होगा।
उपस्थित लोगों द्वारा उनको बताने पर कि आपके पिता के बलिदान से आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा तो बाल प्रीतम ने उत्तर दियाः 
“यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।”
अबोध बालक का ऐसा उत्तर सुनकर सब आश्चर्य चकित रह गए। तत्पश्चात गुरु तेगबहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे। और यदि आप गुरु तेगबहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे। इससे औरंगजेब क्रुद्ध हो गया और उसने गुरु जी को बन्दी बनाए जाने के लिए आदेश दे दिए।
औरंगज़ेब के लिए  यह  चुनौती उसकी धर्मान्धता पर कडा प्रहार था। लेकिन त्याग के मूर्ति गुरु तेग़ बहादुर दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए। औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग़ बहादुर जी नहीं माने तो उन पर अमानवीय अत्याचार किये गए। उन्हें कैद कर लिया गया,उनके दो शिष्यों का उनके समक्ष ही वध कर दिया गया। गुरु तेग़ बहादुर जी को ड़राने की हर कोशिश की गयी, परन्तु उन्होंने पराजय नहीं मानी।
तब औरंगज़ेब ने गुरु जी के सामने मृत्यु और इस्लाम में से एक को चुन लेने का विकल्प प्रस्तुत किया। गुरु जी ने धर्म त्याग देने को मना कर दिया ।
औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया।  शहंशाह के आदेशानुसार, पाँच दिन तक अमानवीय यंत्रणायें देने के उपरान्त, 24  नवम्बर 1675 को गुरु जी का सिर काट दिया गया। गुरु जी ने हँसते-हँसते बलिदान दे दिया। गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है।
गुरुजी धर्म की रक्षा के लिए अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध अपने चारों शिष्यों सहित धार्मिक एवं  वैचारिक स्वतंत्रता की खातिर शहीद हो गए। ‘धरम हेत साका जिनि कीआ, सीस दीआ पर सिदक न दीआ’ (बचित्र नाटक)। निःसंदेह गुरुजी का यह बलिदान राष्ट्र की अस्मिता एवं धर्म को नष्ट करने वाले आघात का प्रतिरोध था। आज गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस पर समस्त टॉपयॅप्स टीम उन्हें नमन करती है।

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