देश की आजादी के लगभग सत्तर साल होने को हैं और बाबा साहेब आंबेडकर के 126वें जन्मोत्सव पर देश उनको याद कर रहा है। लेकिन आज भी बहुत सारे लोगों के मन में दलितों को लेकर कुंठा है और वे उन्हें आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते। इसमें कोई दो राय नही है कि दलित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप से पिछड़े हुए हैं। जो दलित नेता राजनीति में सक्रिय हैं या मंत्री जैसे पदों तक पहुंचे हैं, कई बार उनकी आवाज को भी दबा दिया जाता हैं। ऐसे में एक सामान्य दलित के साथ कैसे पेश आया जाता है, वह समझा जा सकता है।

आए दिन दलितों के साथ मार-पीट, हिंसा, गाली-गलौज और दलित परिवारों की महिलाओं से बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं। यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक है। दलितों को जिस प्रकार से हांकने या डराने के लहजे में संबोधित किया जाता है, उनके लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वह सचमुच बहुत दुखी करने वाला है। यहां तक कि छोटे बच्चे भी कई जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते रहते हैं। आज भी इस तरह के किस्से आम हैं कि दलितों को मंदिर प्रवेश से रोक दिया गया। बहुत-सी खबरें ऐसी होती हैं, जिन्हें दबा दिया जाता है। मीडिया में दलितों की पहुंच न के बराबर है।

आरक्षण पर जब कभी सामान्य वर्ग के लोगों से बात होती है तो वे बिना सोचे-समझे आरक्षण को खत्म करने की बात करते हैं। एक सामान्य वर्ग के विद्यार्थी ने मुझे एक बार कहा था कि आरक्षण इसलिए दिया गया था कि ये लोग देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें, लेकिन ये लोग तो अब हमसे भी आगे जा रहे हैं। तो क्या दलित पृष्ठभूमि वाले लोगों को किसी से आगे निकलने का हक नहीं हैं? आखिर ऐसी कुंठित और संकीर्ण मानसिकता का आधार क्या होता है? एक सभ्य समाज के लिए यह कलंक है कि हम आज आधुनिक और तकनीकी युग में इस तरह की मानसिकता रखते हैं।

सही है कि आजादी के बाद के सफर में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन अभी उस स्तर का सुधार नहीं हुआ जो एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में वहां के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ों के लिए होना चाहिए था। सूचनाधिकार कानून के तहत सामने आई एक जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार के मंत्रालयों में अवर सचिव से लेकर सचिव स्तर तक केवल 8.63 फीसदी ही दलित पहुंच सके हैं, वहीं 82 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग इस स्तर पर मौजूद हैं। पुलिस विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में अब तक केवल 10.62 प्रतिशत दलित ही इस विभाग में जगह बना पाए हैं।

एक कुतर्क दिया जाता हैं कि दलितों के पास वह प्रतिभा नहीं होती, जिस पद पर उसे बहाल किया जाता है। सच इतिहास से लेकर आज तक मौजूद है। घोर जात-पात, अंधविश्वास, सामाजिक रुढ़ियों में बंधे समाज को अपने ज्ञान से प्रकाश दिखाने वाले संत कबीर से लेकर रैदास तक के उदाहरण मौजूद हैं तो यह भी याद रखना चाहिए कि गुरु तेग बहादुर के कटे शीश को लाने के लिए एक दलित ने अपना शीश कटवा कर वहां रखवा दिया था। हमें यह भी नहीं बताया जाता कि 1857 कि क्रांति में मंगल पांडे के समय में ही मातादीन भी थे। वहीं 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को किले से बाहर सुरक्षित भेजने वाली उनकी हमशक्ल दलित महिला झलकारी बाई थी जो अंग्रेजों से युद्ध करती हुई मारी गई थी।

बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान के रूप में इस देश को क्या दिया, उस पर न केवल इस देश की तमाम महिलाओं और दलित-वंचित जातियों लोग, बल्कि दुनिया के सभी जागरूक लोग गर्व करते हैं।

’गौरव कुमार, कुरुक्षेत्र विवि

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *