​साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ! डोनाल्ड ट्रंप मुर्दाबाद ! 

अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अपने अब तक के सबसे बड़े गैर-नाभकीय शस्त्र का प्रयोग किया है, नंगारहार की पहाड़ियों में तालिबानियों के कुछ अड्डों को खत्म करने के लिये।

सारी दुनिया इस पर कुछ इस प्रकार से शांत लगती है जैसे सबकों कोई सांप सूंघ गया है। यह तो हम समझ सकते हैं कि आदमी अपने जीवन के सबसे डरावने, असहनीय अनुभवों को भूल कर चलना चाहता है क्योंकि अन्यथा उस आतंक के साये में उसका जीना ही मुश्किल हो जायेगा। लेकिन यह क्या है, जब आने वाले सबसे भयंकर दिनों के संकेतों पर भी दुनिया गौर करने से इंकार करने लगे ! यह डर और आतंक की एक पराकाष्ठा है, जिसमें हतबंब मनुष्य की विचार करने की शक्ति ही खत्म हो जाती हैै, वह संवेदनशून्य कठपुतला लगने लगता है !

रूस ने प्रतिक्रिया में कहा है कि उसके पास ऐसा बम है, जिसे मदर आफ आल बाम्ब्स का बाप कहा जा सकता है। लेकिन इन्हीं सब बातों से तो वास्तव में दुनिया की रूह कांप रही है। आज जब बच्चा भी इस सच को जानता है कि दुनिया के देशों के पास इतनी बड़ी संख्या में नाभिकीय बम जमा है कि इस धरती को पचास बार नेस्तनाबूद किया जा सकता है, तब ऐसे भारी मां और बाप बमों का प्रयोग या चेतावनी, भले गैर-नाभकीय बमों की ही क्यों न हो, मानव मात्र के अस्तित्व के अंत का दृश्य सामने लाने लगती है। फ्रायड ने बताया था कि मनुष्य कभी खुद की मृत्यु के सपने नहीं देखता है। सपने के बजाय, जिंदा रहते भी अपनी मौत को स्वीकारना मनुष्य के धर्म के खिलाफ माना जाता है।

ऐसे में कोई यदि मनुष्यता का अंत करके अपने को इतिहास में अमर करने की कल्पना कर रहा हो, तो वह शुद्ध रूप से पागल के अलावा और क्या कहलायेगा। एक अस्तित्वहीन प्रजाति का इतिहास तो डाइनासोरों के इतिहास की तरह ही अस्थि-पंजरों के ढेर के अलावा कुछ नहीं होगा। आज लगता है जैसे दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी पर कुछ इसी प्रकार से इतिहास में अमर हो जाने का भ्रम पाले हुए डोनाल्ड ट्रंप नामक पागल बैठ गया है। कहा जा रहा है कि अमेरिका के इतिहास में सत्ता संभालने के बाद ही जनता के बीच इससे कम साख वाला आज तक कोई दूसरा राष्ट्रपति नहीं हुआ है।

अमेरिका में भी हमारे देश की तरह ही एक आम लोगों और प्रचार माध्यमों का भी एक तबका ऐसा है जो हमेशा युद्ध के लिये आतुर रहता है। सामरिक-औद्योगिक गठबंधन की सचाई तो वहा की अर्थ-व्यवस्था का एक मूलभूत तत्व है जिसकी परिणतियों में मानव-अस्तित्व के अंत की सारी संभावनाएं निहित है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के प्रत्येक अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी न किसी रूप में अपनी सत्ता की इस आनुवांशिक दानवी शक्ति का परिचय दिया है।

पिछली सदी के सत्तर के दशक में वियतनाम से खदेड़ दिये जाने के बाद लगभग एक चैथाई सदी तक खास तौर पर सोवियत संघ और समाजवादी शिविर ने उसकी नकेल कसके रखी थी। लेकिन सन् ‘91 में सोवियत संघ और समाजवादी शिविर के पतन के एक दशक के बाद ही जब 21वीं सदी के प्रारंभ में जार्ज बुश सत्ता में आया, तभी से फिर अमेरिका के सत्ता के गलियारे में नागासाकी और हिरोशिमा वाले शौर्य के राक्षसी प्रेतों का साया मंडराने लगा है। सारी दुनिया में मानव अधिकारों की रक्षा के लिये एक नई आशा के साथ सामने आए बराक ओबामा ने भी भयंकरतम युद्ध के जरिये समस्याओं के समाधान का रास्ता नहीं छोड़ा था। और अब तो ट्रंप आ गया है, कहा जा सकता है, अमेरिकी सत्ता की सिर्फ और सिर्फ बुराइयों का एक जघन्य प्रतिनिधि। पिछले सत्रह सालों से सारी दुनिया में चल रहे अमेरिकी अश्वमेध यज्ञ की पृष्ठभूमि में, साम्राज्य और प्रभुता के अपने सभ्यता-संघर्ष को उसके चरम तक ले जाने को आतुर एक उन्मादित नेता।

उसे कोई परवाह नहीं है कि जैसा वह समझ रहा है, दुनिया उसके लिये इतनी सरल और चुनौती-विहीन नहीं है। रूस ने कहा है, उसके पास अमेरिकी बम का बाप है, तो चीन ने साफ चेतावनी दी है कि उत्तरी कोरिया पर किसी भी कार्रवाई का प्रतिरोध किया जायेगा। सीरिया के सवाल पर रूस ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी प्रस्ताव पर वीटो लगाया है। यूरोप के सारे देशों ने अपने प्रतिरक्षा बजट में बढ़ोतरी शुरू कर दी है और अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के लिये तैयार नहीं है।

फिर भी, हालात की नाजुकता को समझते हुए अभी सब बिल्कुल चुप है ! डरे हुए है ! सब सोच रहे हैं कि पता नहीं किस क्षण हर कोने से नाभिकीय बमों की बारिस के बटन दबने लग जाए ! सबसे बड़ा खतरा इस बात का है कि विवेकहीन ट्रंप दुनिया के समझदारों के इस डर का फायदा उठाने के चक्कर में ही ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकता है कि उसके बाद किसी के लिये भी कहने-करने को कुछ नहीं रहेगा। धरती इस ब्रह्मांड का एक ऐसा नक्षत्र होगी जहां की मिट्टी में अस्थि-पंजरों के मलबे से लाखों-करोड़ों वर्षों में फिर किसी जीव की उत्पत्ति और उसका मानव रूपी विकास होगा तो होगा !

ट्रंप के इस मदर आफ आल बाम्ब्स के प्रयोग की सारी दुनिया से जनता के स्तर पर भी एक स्वर में निंदा की जरूरत है।

साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ! डोनाल्ड ट्रंप मुर्दाबाद !

-अरुण माहेश्वरी : वरिष्ठ लेखक/स्तंभकार 

One Reply to “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ! डोनाल्ड ट्रंप मुर्दाबाद ! -अरुण माहेश्वरी”

  1. डोनाल्ड ट्रम्प को मुर्दाबाद मत कहो, उस मुर्दे मन पर दया करो।बल्कि यह कहो ‘डोनाल्ड ट्रंप के मन मस्तिष्क जिंदा हो’।
    उसके मुर्दई मन की तो छाया भी न पड़े मानवता पर।
    अरुण भाई की चिंता के सरोकारों को बखूबी समझा जाता सकता है।
    खुदा करें मानवता सलामत रहे, इसका परचम लहराता रहे और हमारी भावी पीढ़ी थके-हारे-हताशा ट्रम्प के अवशेष देखने जाया करें किसी अजायब घर में !

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