आज हम देश में एक ऐसी सरकार को देख रहे हैं, जो क़ानून के शासन को कमज़ोर करने पर तुली हुई है । गुजरात में जिस प्रकार 2002 के जन-संहार और फिर बेक़सूर लोगों के फ़र्ज़ी इनकाउंटर के अपराधियों को बचाने की कोशिशें आज भी जारी है, वहीं लोग केंद्र सरकार में आकर क़ानून के शासन की अवहेलना की इस बीमारी को पूरे देश में फैला दे रहे हैं । यहाँ तक कि संसद का ऊपरी सदन कहलाने वाले राज्य सभा के अधिकारों का पूरी नंगई के साथ हनन किया जा रहा है ।  


किसी भी देश में क़ानून के शासन का क्या महत्व होता है, यह सीधे तौर पर किस प्रकार से जनता की आर्थिक परिस्थिति को प्रभावित करता है, इसे जानना हो तो ‘इकोनोमिस्ट’ के ताज़ा अंक (8 अप्रैल 2017) की इस छोटी सी रिपोर्ट ‘Shrink wrap’ को जरूर पढ़ा जाना चाहिए । यह रिपोर्ट आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी आफ मैरीलैंड के शोधार्थी क्रमश: स्टीफ़ेन ब्राडबेरी और जॉन वैलिस के एक अध्ययन के बारे में है जिसमें यूरोप और नई दुनिया के 18 देशों से लिये गये 13वीं सदी से लेकर अब तक के आँकड़ों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि आर्थिक मंदी के बावजूद यह जरूरी नहीं होता है कि आर्थिक संकुचन भी हो और आम लोगों की प्रति व्यक्ति आमदनी में कोई गिरावट आए । 


दोनों शोधार्थियों ने यह बताया है कि जीडीपी में गतिरोध या गिरावट, मंदी के बावजूद आम आदमी के जीवन पर उसका विशेष असर न पड़ने का सबसे प्रमुख कारण क़ानून के शासन को पाया गया है । उन्होंने देखा कि ख़ास तौर पर 1950 के दशक के बाद इन देशों में क़ानून का शासन सख़्ती के साथ बने रहने के कारण आर्थिक विकास की दर में गिरावट के बावजूद आम लोगों की आमदनी अप्रभावित रही और इसीलिये कभी इनमें आर्थिक गतिरोध या संकुचन पैदा नहीं हुआ । 


हमारे जैसे देश का सच तो यह है कि यहाँ भले कोई प्रकृतिक विपदा आए या आर्थिक विपदा या नोटबंदी की तरह की सरकार की मूर्खतापूर्ण नीतियों से पैदा होने वाला संकट, इन सबकी मार को सिर्फ आम आदमी को ही सहना पड़ता है । क़ानून के शासन की दशा यह है कि ख़ुद राजनेता न्यूनतम मज़दूरी के क़ानून को लागू करने के बारे में गंभीर नहीं होते है । क़ानून का नहीं, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का शासन चलने के कारण हमेशा सामान्य अर्थ-व्यवस्था और आम आदमी का जीवन अनिश्चय के भँवर में फँसा दिखाई देत है । नेता लोग नौजवानों को एक सभ्य नागरिक के बजाय गो गुंडा बना कर अपना लठैत बनाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं । 

-अरुण माहेश्वरी
वरिष्ठ स्तंभकार/लेखक

हम यहां इकोनोमिस्ट’ की इस रिपोर्ट को साझा कर रहे हैं : 

The Economist | Shrink wrap 

http://www.economist.com/news/finance-and-economics/21720311-faster-growth-not-due-bigger-booms-less-shrinking-history?frsc=dg%7Ce

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