​कब तक बच पाउंगी 

बर्फीली हवाओं के बीच 

हादसे की चपेट में आये शहर की तरह 

टुकड़े टुकड़े होकर बिखर जाऊँगी 

तुमने सोचा कभी ?

क्या बीतेगी मुझपर 

गर तुम बन गये आकाश 

और मैं धरती पर खड़ी 

जड होकर दूर से 

निहारूंगी तुम्हें 

बीते दिनों का चाक फिर घूमेगा

आँखों के सामने 

पर तब फ़ैली  

अनंत दूरियां होगीं 

उस भयानक अँधेरे में मैं 

रोशनदान से आती 

थोड़ी सी रोशनी को 

क्या बचा के रख पाउंगी

यदि बचा भी पायी  

पर कब तक और कितनी देर तक 

…सरिता ..

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