​आज फणिश्वर नाथ रेणु की पुण्य तिथि पर उनका स्मरण करते हुए सरला माहेश्वरी की कविता ‘वे बहुत ख़ुशहाल है’ का पाठ:

   छाया:  फणिश्वर नाथ रेणु


वे बहुत ख़ुशहाल हैं !


वे बहुत ख़ुशहाल हैं

वे देखते नहीं किसी बदहाल को

उनके चारों ओर बजता है मधुर गीत

“मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती”


उनके चारों ओर बस हरियाले खेत हैं

धन-धान्य से भरे खलिहान हैं

दूध-घी और शहद की नदियाँ हैं

पिंजरे में सोने की चिड़िया है

खम्मा अन्नदाता का पार्श्व संगीत है


नहीं चाहते, कोई संसारी

भूल से भी काट जाए उनका रास्ता

पर लाख चाहने पर भी

ऐसा हो नहीं पाता

अच्छे दिनों पर भी पड़ जाता है बुरा साया


जैसे लाख पहरों के बावजूद

सिद्धार्थ की नज़रों के सामने

पड़ ही गये थे

अनजाने, अपरिचित दुख


खुलने लगे थे

जीवन के अर्थ

जीवन नहीं है किसी कल्पित स्वर्ग का नाम

जहाँ नहीं है कोई द्वन्द, कोई द्वेष,कोई दुश्मन


जीवन नहीं है 

कोई मिथ्या

देखो ! अन्यथा न लेना

जीवन है एक बड़ा सत्य


जीवन के इस सत्य में

भूख है, ग़रीबी है,शासक है, शोषक है

न्याय है, अन्याय है,धोखा है, विश्वास है

पुण्य है, पाप है, हार है, जीत है


क्या करूँ इन आँखों का

लाख न चाहने पर भी ये सब दिख ही जाता है

जैसे भूखा पेट

लाख मना करने पर भी रोटी ही देखना चाहता है


हाय रे ये जीवन की मजबूरियाँ !

विचारों की ही तरह

पाँवों में बंध ही जाती हैं

चूल्हे में लकड़ियों की तरह जलने लगती है


जैसे भूखे पेट की आग

और एक दिन

यह आग …

सुलगते, सुलगते बन जाती है

दावानल …


देखो !

इससे पहले कि

यह दावानल जलाकर ख़ाक कर दे

खोल लो अपनी आँखें, जाग जाओ

 कवित्री सरला माहेश्वरी

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