​              “यादें”

अब नहीं होती नम आँखें

जब मिलती हूँ अपनों से

अब नहीं भीगतीं  पलकें

उन अनछुए से सपनों से

अब छूटती ही नहीं रुलाई

किसी और के उलाहनों से

कब से नहीं मैं गुस्साई 

उन बेगानो सी बातों से

मरती  नहीं मेरी भूख

अब किसी के तानों से। 


अब घुटता नहीं दिल मेरा

किसी के भी अपशब्दों से

अब घुलता नहीं तन मेरा

किसी की भी उपेक्षाओं से 

दाग वाला ही सही

यह तन है मेरा

मेरा अपना तन।


आँखें नम होने से पहले 

अब सज़ा लेती हूँ ख्वाब 

पसंद के तीखे स्वाद का

खाती हूँ लावा केक, सुनती हूँ

गुज़ारिश के वो रोमांटिक गाने 

अकेले देखके खुश होती हूँ मूवी मैं।


मन भारी होता है

अब रोना नही आता 

पहनती हूँ अपनी क्रोक

चल देती हूँ स्कूटी पे कहीं दूर

सुनसान सड़को को नापते

जग्गू ओर किशोर को गुनगुनाते

सब खोके अब आखिर में

अपनी जिंदगी जीने लगी हूँ मैं

चालीस के पास होने लगी हूँ मैं।

स्नेहा चौहान(बाबा)

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